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म्यूचुअल फंड में क्या है एक्सपेंस रेश्यो और निवेशकों के इंवेस्टमेंट को कैसे करता है प्रभावित

म्यूचुअल फंड में क्या है एक्सपेंस रेश्यो और निवेशकों के इंवेस्टमेंट को कैसे करता है प्रभावित
Vandana Punj
Vandana Punj

म्यूचुअल फंड निवेशकों की पसंद बन कर उभर रहा है। लोग बढ़-चढ़ कर इसमें निवेश कर रहे हैं। हालांकि म्यूचुअल फंड में निवेश करन से पहले इससे जुड़े कई सारे फैक्टर्स जैसे- टाइप, सही फंड, एक्सपेंस रेश्यो, जोखिम क्षमता और निवेश की रकम आदि पर ध्यान देना जरूरी है। इन्हीं सारे फैक्टर्स में से एक है एक्सपेंस रेश्यो, जो आपके निवेश पर मिलने वाले रिटर्न को प्रभावित कर सकता है इसलिए इसे नजरअंदाज न करें। चलिए इस लेख में जानते हैं कि म्यूचुअल फंड एक्सपेंस रेश्यो (Mutual Fund Expense Ratio) क्या होता है और ये आपके निवेश को कैसे प्रभावित करता है:  

एक्सपेंस रेश्यो क्या होता है?

यह वह राशि होती है, जो आप अपने म्यूचुअल फंड के प्रबंधन के लिए फंड हाउस मैनेजमेंट को फीस के तौर पर देते हैं। दूसरे शब्दों में कहे तो आप म्यूचुअल फंड (Mutual Fund) में अपने निवेश के प्रबंधन के लिए एसेट मैनेजमेंट कंपनियों (AMC) को कुछ चार्ज देते हैं, इसे ही एक्सपेंस रेश्यो कहते हैं। यह म्यूचुअल फंड के हिसाब से अलग-अलग होता है। इसका भुगतान सालान आधार पर किया जाता है, लेकिन इसकी गणना आपके प्रतिदिन निवेश के आधार पर किया जाता है।  

ये भी पढ़ें: डीमैट अकाउंट क्या है और इससे म्यूचुअल फंड खरीदने के क्या फायदे हैं 

म्यूचुअल फंड एक्सपेंस रेश्यो को कैलकुलेट कैसे करें?

एक्सपेंस रेश्यो= कुल खर्च/एवरेज एयूएम (एसेट अंडर मैनेजमेंट)
Expense Ratio= Total expenses/Average AUM

  • कुल खर्च- इसमें एमएनसी के फंड मैनेजर की फीस, मार्केटिंग और वितरण खर्च, लीगल/ ऑडिट कॉस्ट आदि शामिल होता है।
  • एवरेज एसेट अंडर मैनेजमेंट (एयूएम)- फंड विशेष में सभी निवेशकों के पैसे का कुल मूल्य

उदाहरण से कैलकुलेशन समझते हैं- मान लें, एसेट अंडर मैनेजमेंट (एयूएम) के तहत 700 करोड़ की एक इक्विटी म्यूचुअल फंड है और सभी खर्चों के साथ इसकी लागत 14 करोड़ रु. तक है। इसलिए फॉर्मूले के तहत एक्सपेंस रेश्यो (14 करोड़ /700 करोड़) = 2%  होगा। ये साल में एक बार कैलकुलेट किया जाता है। और यह एक्सपेंस रेश्यो सभी निवेशकों द्वारा फंड मैनेजमेंट कंपनियों को दिया जाता है। जब तक कि वह स्कीम में निवेश करते रहते हैं। किसी म्यूचुअल फंड की नेट एसेट वैल्यू (NAV) कुल खर्चों को घटाने के बाद निकाली जाती है। 

एक्सपेंस रेश्यो पर सेबी के नियम

भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) म्यूचुअल फंड को रेगुलेट करती है। निवेशकों के हितों की रक्षा के लिए उससे जुड़े नियम व कानून बनाती है। इसी क्रम में एक्सपेंस रेश्यो की अधिकतम सीमा तय करना भी शामिल है। इस तय लिमिट से अधिक राशि कोई एएमसी निवेशकों से नहीं ले सकती। हालांकि यह लिमिट फंड के प्रकार (इक्विटी- नॉन इक्विटी, फंड ऑफ फंड (FOFs) ईटीएफ आदि) पर निर्भर करता है। 

डायरेक्ट प्लान के मुकाबले रेगुलर प्लान का ‘एक्सपेंस रेश्यो’ अधिक क्यों

म्यूचुअल फंड स्कीम का डायरेक्ट प्लान आप म्यूचुअल फंड से सीधे तौर पर खरीदते हैं। जबकि रेगुलर प्लान आप एडवाइजरी या डिस्ट्रीब्यूटर के माध्यम से खरीदते हैं। इसलिए इस प्लान में म्यूचुअल फंड कंपनी को डिस्ट्रीब्यूटर को भुगतान करना पड़ता है। जिसे बाद में एक्सपेंस रेश्यो के तौर पर वसूला जाता है। इसी वजह से डायरेक्ट प्लान के मुकाबले रेगुलर प्लान का एक्सपेंस रेश्यो अधिक होता है। 

ये भी पढ़ें: कई तरह के होते हैं म्यूचुअल फंड, निवेश करने से पहले जान लें

एक्सपेंस रेश्यो का आपके निवेश पर असर 

चूंकि एक्सपेंस रेश्यो की कटौती प्रतिदिन आपके निवेश से होती है इसलिए इसका सीधा असर आपको मिलने वाले रिटर्न पर पड़ता है। जितना अधिक एक्सपेंस रेश्यो होगा उतने ही पैसा कट होकर आपको रिटर्न मिलेगा। 

उदाहरण से समझें- अगर आप किसी म्यूचुअल फंड में 5,000 रु. निवेश करते हैं। उसका एक्सपेंस रेश्यो 2% है तब (2%/365=0.0054%) प्रतिदिन आपके निवेश से कट जाएगा। दूसरे शब्दों में कहे तो अगर आपको सालाना रिटर्न 15% मिलना होता तो 2% एक्सपेंस रेश्यो कट कर 13% के हिसाब से ही रिटर्न मिलेगा। 

इसलिए कम एक्सपेंस रेश्यो वाला म्यूचुअल फंड आपके लिए फायदेमंद हो सकता है, क्योंकि आपके रिटर्न से कम हिस्सा कटेगा। हालांकि इसका ये मतलब बिल्कुल भी नहीं है कि कम एक्सपेंस रेश्यो वाले म्यूचुअल फंड अधिक एक्सपेंस रेश्यो वाले म्यूचुअल फंड से बेहतर है। किसी भी म्यूचुअल फंड में निवेश करने से पहले एक्सपेंस रेश्यो, रिटर्न और अपनी जोखिम क्षमता का मूल्यांकन अवश्य करें, इसके बाद ही निवेश करें।

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